दीप त्रिवेदी कृत ‘ताओ ते चिंग : बुद्धिमत्ता के सूत्र’ से चयनित उद्धरण

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  1. लाओत्से चीन के महानतम दार्शनिक थे। उनसे ज्यादा बुद्धिमानी की बात मनुष्य जाति के इतिहास में कभी किसी ने नहीं कही है। — Page 1
  2. मनुष्य की छिपी इंटेलिजेंस जगाने के इससे श्रेष्ट सूत्र दूसरे नहीं हो सकते हैं। — Page 1
  3. बुद्धिमान व्यक्ति की अपनी कोई चाह, कामना, लालसा नहीं होती और जिनकी अपनी कोई ऐषणा, आकांक्षा होती है वे जीवन भर दौड़ते रहते हैं। — Page 2
  4. जब तक मनुष्य के पास बुद्धिमत्ता की आँख नहीं होती तब तक वह हर स्थिति-परिस्थिति का उल्टा-पुल्टा अर्थ निकालता रहता है। — Page 2
  5. इस पुस्तक का प्रयोजन यह है कि व्यक्ति की बुद्धिमत्ता को जाग्रत किया जाए ताकि वह सत्य को सत्य की तरह देख सके। — Page 2
  6. सत्य को सत्य की तरह, शिव को शिव की तरह और सुन्दर को सुन्दर की तरह देख सकें। — Page 2
  7. यदि मनुष्य को एकबार सत्य दिखाई पड़ने लग जाये तो फिर उसे क्या करना उचित है, यह समझाने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। — Page 7
  8. जीवन में मनुष्य को जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह उसके अपने द्वारा लिये गये उचित-अनुचित निर्णयों का परिणाम होता है। — Page 7
  9. जो मनुष्य जीवन में जितने ज्यादा उचित निर्णय करता है, उतना ही ज्यादा वह सफल होता चला जाता है। — Page 7
  10. उचित निर्णय करने के लिये मनुष्य को चीज जैसी है, वैसी ही दिखना अत्यंत आवश्यक है। — Page 7
  11. आज का मनुष्य, मनुष्य जाति के ज्ञात इतिहास का सबसे ज्यादा बुद्धिमान मनुष्य है। — Page 7
  12. लाओत्से के सूत्र हमारी इंटेलिजेंस बढ़ाने के सूत्र हैं। सम्पूर्ण दृष्टि परिवर्तन के सूत्र हैं। — Page 9
  13. लाओत्से हर वस्तु को सीधे-सीधे देखने के पक्षधर हैं। — Page 9
  14. लाओत्से धर्म को, स्वभाव को “ताओ” कहते हैं। — Page 9
  15. जो भी निर्णय जितना ज्यादा क्षणिक होता है, उतना ही श्रेष्ठ होता है। — Page 10
  16. जिस निर्णय को करने में जितना ज्यादा सोचा गया होता है, वह निर्णय उतना ही गलत हो जाता है। — Page 10
  17. मनुष्य की चेतना उस समय सीमाएँ तोड़ देती है, जब भी मनुष्य पूर्ण वर्तमान के क्षण में आ जाता है। — Page 10
  18. जीवन में जो निर्णय जितना ज्यादा क्षणिक होता है, उतना ही श्रेष्ठ होता है। — Page 11
  19. जो निर्णय बहुत ज्यादा सोचकर लिया जाता है, वह निर्णय हमेशा गलत साबित होता है। — Page 11
  20. शिखर पर ज्यादा सावधानी आवश्यक होती है। — Page 11
  21. सफलता टिकाने के लिये लगातार सावधानी बरतना आवश्यक है। — Page 11
  22. इतिहास में उन राजाओं ने हमेशा मुँह की खायी है, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण ध्यान दुश्मनों की जासूसी करने में लगाया। — Page 12
  23. यदि जीवन में जीतना चाहते हो तो विजय पर ध्यान केन्द्रित मत करना, परंतु अपना पूरा ध्यान पराजय से बचने पर लगाना। — Page 12
  24. पराजय से बचना विजय को निमंत्रण है। — Page 13
  25. नुकसानी की संभावना समाप्त होने पर ही नफे की शुरुआत है। — Page 13
  26. जब भी मनुष्य की कुछ पाने की जिज्ञासा मजबूत होती है, तब उससे उसके लिये जो भी करना आवश्यक है, वह होता है। — Page 13
  27. जीवन में सावधानी और होश पल-पल आवश्यक है। — Page 13
  28. जब हार की संभावना पूरी तरह से समाप्त हो जाती है, तब ज्यादा सावधानी की जरूरत होती है। — Page 13
  29. जीत को हार में बदलने में जरा भी समय नहीं लगता है। — Page 13
  30. आज के असंभावित में भविष्य के संभावित को देख लेना ही, सच्ची इंटेलिजेन्स है। — Page 13
  31. जहाँ भी चेतना का थोड़ा सा भी विकास है, वहाँ स्वतंत्रता ही आनंद है। — Page 14
  32. स्वतंत्रता मनुष्य चेतना की अंतिम ऊँचाई है। — Page 14
  33. जीवन का कोई भी संघर्ष जब अस्सी प्रतिशत निबट जाता है, तब अपना होश अपनी सावधानी बढ़ाना। — Page 14
  34. ‘ताओ’ नामक छाता मनुष्य की सारी मुसीबतों से रक्षा करता है। — Page 15
  35. पहाड़ियों पर दुर्घटना की संभावना कम होती है… ज्यादा दुर्घटनाएँ सीधे राजमार्ग पर होती हैं। — Page 15
  36. परिणाम से कारण समझना हजार गुना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। — Page 16
  37. जब ‘ताओ’ का नाश होता है, तब सद्गुण आते हैं। — Page 18
  38. जब सद्गुण का भी नाश होता है तब दया आती है। — Page 18
  39. जब दया का नाश होता है, तब न्याय आता है। — Page 18
  40. जब न्याय का नाश होता है तब आचरण और नियम होते हैं। — Page 18
  41. मनुष्य के जीवन में सद्गुणों का उदय इस बात की खबर है कि उसके जीवन में से धर्म का लोप हो चुका है। — Page 18
  42. मन और कुछ नहीं हमारा अपना कम्प्युटर है। — Page 19
  43. हमारा मन एक कम्प्युटर है। परंतु हम मन नहीं हैं। — Page 20
  44. हम मन के मालिक हैं, मन हमारा नौकर है। — Page 21
  45. कोई भी कम्प्युटर, ऑपरेटर के प्रोग्राम के बाहर का डेटा नहीं दे सकता है। — Page 21
  46. कम्प्युटर परिणाम चाहने के अनुसार नहीं देता है, बल्कि प्रोग्राम के अनुसार देता है। — Page 22
  47. विचारकों की आँख सिर्फ परिणाम देख सकती है… मनोविज्ञान की आँख कारण भी देख लेती है। — Page 22
  48. जीवन परिवर्तित तभी होता है, जब देखने और सोचने की दृष्टि में परिवर्तन हो। — Page 22
  49. मन में एक एंट्री डालने के पहले हजार बार सोचना। — Page 26
  50. मन से अपने को अलग पहचानने का एहसास ही होश में आने की शुरुआत है। — Page 30
  51. ताओ का स्वभाव है क्षण-क्षण निःस्वार्थ भाव से जीना। — Page 31
  52. न्याय की भीख दूसरों से माँगने वाला कमजोर मनुष्य है। — Page 36
  53. धार्मिक मनुष्य भिखारी नहीं, सम्राट होता है। — Page 36
  54. जीवन में सफल वह है, जिसको अब कुछ भी नहीं चाहिए। — Page 39
  55. जिसका वर्णन किया जा सके वह शाश्वत ‘ताओ’ नहीं है। — Page 42
  56. जिसको नाम दिया जा सके वह शाश्वत नाम नहीं है। — Page 42
  57. जिसको नाम न दिया जा सके वही अविनाशी है। — Page 42
  58. नाम देने की क्रिया ही सभी वस्तुओं का मूल है। — Page 42
  59. इच्छाओं से मुक्त हो जाओ, आपको सारे रहस्यों का राज मिल जाएगा। — Page 42
  60. यदि आप इच्छाओं से बंधे हुए हैं, तो सिर्फ बाह्य रूप को ही देख पायेंगे। — Page 42
  61. अंधकार के भीतर और अंधकार — यही है सारे ज्ञान का प्रवेश द्वार। — Page 42
  62. जब लोग कुछ चीजों में सौंदर्य देखते हैं, तो बाकी चीजें कुरूप हो जाती हैं। — Page 68
  63. जब लोग कुछ चीजों को अच्छा मानते हैं, तब दूसरी वस्तुएँ खराब हो जाती हैं। — Page 68
  64. होना और नहीं होना, एक दूसरे को जन्म देते हैं। — Page 68
  65. मुश्किल और सहजता एक दूसरे को टिकाये रखते हैं। — Page 68
  66. लंबा और छोटा एक दूसरे को परिभाषित करते हैं। — Page 68
  67. प्रथम और आखिर एक दूसरे का अनुसरण करते हैं। — Page 68
  68. गुरु कुछ किये बगैर कार्य करता है और बिना बोले सिखाता है। — Page 68
  69. चीजें उत्पन्न होती हैं, वह उन्हें होने देता है। — Page 68
  70. उसके पास है पर उसकी मालकियत नहीं है। — Page 68
  71. वह कार्य करता है, पर कोई आशा नहीं रखता है। — Page 68
  72. अहंकार सारे दुःखों का मूल है। — Page 70
  73. मनुष्य परम स्वतंत्र है। स्वतंत्रता ही धर्म है। बंधना अधर्म है। — Page 70
  74. जो होता है, होने दें। — Page 71
  75. बुद्धिमान मनुष्य किसी भी वस्तु का मालिक नहीं होता, खजानची होता है। — Page 89
  76. यदि आप महान व्यक्तियों को जरूरत से ज्यादा महत्व देते हैं, तो प्रजा दोगली हो जाती है। — Page 92
  77. यदि आप जायदाद का ज्यादा मूल्यांकन करते हैं, तो लोग चोरी करना शुरू कर देते हैं। — Page 92
  78. वास्तविक गुरु सर्वप्रथम सबकी बुद्धि खाली कर देता है। — Page 92
  79. जो लोग ज्ञानी होने का दावा करते हैं, वह अपने दिमाग में उलझन पैदा करते हैं। — Page 92
  80. कुछ भी न करने का प्रयत्न करें, और फिर सब अपने आप ठीक जगह जम जाएगा। — Page 92
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